जिला_जांजगीर_चाम्पा
राज्य__छत्तीसगढ़
विधा---कविता
शीर्षक---हमर छत्तीसगढ़िया
व्याख्या____प्रस्तुत कविता में कवि द्वारा छत्तीसगढ़िया के जीवन शैली खान-पान कार्य उदारता न्याय सबके प्रति समानता का भाव उक्त भावों का वर्णन किया गया है
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हमर छत्तीसगढ़िया
छत्तीसगढ़िया डर के मारे ,घर म खुसरे रहे नहीं ।
ओकर हाथ बज्र के पाबे,दूसरे के कभु रहे नहीं ।
जेन बुता ल हाथ म ले लीस,अउ जबान दे दारीस।
ओ बुता हर होगे समझ, ओकर ले मुकरे नहीं ।
गोठ बात रथे बघवा कस, रईके कोनो गोठियांय ।
देख के नारी मुड़ ढ़ांके,कुरा ससूर कस तिरियांय ।
आघू म बने बइठे नहीं,आघू म कहां पाबे खाना ।
खटिया पीढ़हा माढ़े आरुग, भूइयां म पहवांय ।
रक्शा कस कमाना खाना, बासी बटकी कमती हे ।
गोरस अंगारक मलिया भर, ओतके माढ़े चटनी हे।
ओकर बोझा ओकर कांवर ओकर जोते नांगर ।
खांध म चुप मढ़ा के देख, पता चल जाही का हस्ती हे ।
पोरीस भरके धरे लाठी,गर म सुग्घर सांफी ओरमे ।
घर दुवार कोला बारी चकाचक, रेंगना हाथी कस दलके ।
सब रंग म रंगे जिनगी, डुडुआ पटका करमा सुहाय ।
नीत नियाव म सागर गंभीर, दान पुन म घर भरदे ।
वोही मनखे ल मुरकेटे, घर परिवार समाज अगुन बढ़ाय ।
काना खोरा असक बीमरहा ,खातिर बर सरबस गंवाय।
सच के पांव धो के पीये,चाहे कोनो कुछु समझे ।
मनखे मनखे एक बरोबर,तराजू कस तउल बताय ।
असने भूइयां मोर छत्तीसगढ़,असने मनखे के बासा ।
सबले गुत्तुर बोली भाखा, जैसे मनभर आमा के पाका ।
धोती लुगरा पहिरे चकचक,गहना गुठा लदकाय ।
कुरो म नापा के तामी म संगी, बात हे थाका के थाका ।
गिरधारी लाल चौहान
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया 🙏🙏🙏 प्रस्तुत कविता में छत्तीसगढ़ की संस्कृति के संबंध में बड़ा ही मनमोहक वर्णन किया गया है....शानदार रचना
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