Tuesday, June 2, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- मया

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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला      --  राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक     --  ( मया के गीत )
विधा       --  गीत , छद मुक्त ,
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             मया के गीत 
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चिनहा मया के  फूल गजरा हो ।।
लाने हौ आंखी  बर  कजरा हो ।।
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।।1।।
अइसने मिलबोंअमरइय्या म गोरी,
दुनियां  लगाए  कतको पहरा हो ।

करिया  चूंदी  तोरे  बदरा  बरोबर ,
बेनी बर लाएवं सुघ्घर गजरा हो।।

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।।2।।
दुरिहा जतका  जग करही हमला ,
वतकी मिलबों  संगी   संघरा  हो ।

जेठ दोपहरी अउ तीपै भोंभरा मा,
ओढा़ देना संगी  मया अचरा ओ।।

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।।3।।
चंदा रुपवा तोर सुरुज हे टिकली ,
नयना कारी  कारी  कजरा  हो ।।

हमर मया म जतका बढ़ही पहरा,
होही मया रे  वतनी  गहरा  हो ।।

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।।4।।
जेती देखंव तिहि तिहि दिखथस ,
मया  म  होगेवं  तोरे अंधरा  हो  ।

हिरदे  नयन  मया   बान  चलाए  ,
बुड़गे  मन  अगम   दाहरा   हो ।।

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        रचना ✍🏻
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प्रवीण कुमार ठाकुर
मोबाइल नं.-- 9617440268
पतोरा , छुरिया,राजनांदगाँव 
                   (छ.ग.)  ।
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व्याख्या  :----
प्रस्तुत शीर्षक "मया के गीत" गीत
प्रदत्त सृजन  विषयांतर्गत  सृजित 
है।  जिसमें  रचनाकार ने  प्रियतम
के  माध्यम  से  उक्त  गीत के द्वारा
अपने प्रेम का वर्णन अपनी  प्रिया
के  सम्मुख  करता है और गीत के
माध्यम  से  उसके  सौंदर्य , माधुर्य
रुप का  भी  चित्रण करता है यहां
गीतकार ने संयोग श्रृंगार का  बडा़
ही मनोहारी छँटा प्रस्तुत किया है। 

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