महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक; श्रृंगार रस "निसार हो गई"
विधा-गीत
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हर बात से मैं थी तब अनजान,
चेहरे पे तेरी आँखे जो निगहबान।
तेरी चोर नज़रों की शिकार हो गई
तेरी चाहत में मैं निसार हो गई।।
इक पल की ज़रा भी देर न हुई,
ना बचने का कोई मिला रे बहाना।
दबे पांव तेरा मेरे मन में समाना,
दिल मेरा बन गया तेरा ठिकाना।।
बावरी सी तकती झकझोर हो गई,
तेरी................
सूरत तेरी है बड़ी भोली भाली,
चलाया कैसा जादू तूने ओ सावरा।
मन मेरा इक भी पल न चैन पाए,
बेचैन फिरे होकर मन मेरा बावरा।।
सब कुछ भुलाकर मैं तुझमें खो गई,
तेरी...............
तेरी नज़रों का असर है शामों सहर,
तड़पाती तेरी याद है मुझको हर पल।
बन आई मेरी जान पे घड़ी हर पहर,
तेरी यादों का साया जाता न एक पल।।
एक हो जाएं चलो हम अब देर हो गई,
तेरी चाहत में मैं निसार हो गई।।
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