*निवास-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
*जिला--रायपुर ।
*शीर्षक-"मेरे बचपन के दिन "
*विधा-कविता (छ्न्द-मुक्त )
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***मेरे बचपन के दिन ***
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कितने सुहाने थे,
मेरे बचपन के दिन,
बरसात में भींगना,
पानी में उछ्लना-कुद्ना ,
कागज की, कश्ती बनाना ,
और उसे तैरते देखना--।
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गिल्ली -डंडा ,लट्टू का खेल--
खो--खो, कबड्डी ,
चोर--सिपाही का खेल,
कभी ,तितलियों को पकड़ना--
झूले का खेल--।
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--कितने सुहाने थे----
पल में हो जाता ,दोस्तों से बैर --
कुछ से हो जाता,
पुन: मित्रता का मेल--।
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रहती,बड़ों से,ढेरों शिकायत--
पर,मिलती जब मिठाई
हो जाती,सारी दूर,भी शिकायत--।
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बातें ,कभी,जब पूरी न होवे तो,
नाराज़गी,जल्दी-ही-आती --
उतनी जल्दी भी,
नाराज़गी,दूर हो जाती--।
---कितने सुहाने थे----
पर,अब,वो हँसना कम हुआ,
नाराज़गी के साथ,तनाव भी बढ़ा,
न जाने, दोस्ती हो रही--
ढेरों शिकायत है,जमाने से,
पर दूर नहीं होती ,
और बढ़ती जाती है,
न हो रही है, थोड़ी भी कम,
नादानी नहीं,पर नादानी की,हरकत होती --।
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----कितने सुहाने थे-------
वक़्त ने,करवट है बदली,
आम--आदमी , हुआ भ्रष्ट--
चला जबसे,लेन-देन का खेल,
पैसों वालों का,अब हुआ खेल,
बिन पैसों,वालों का,निकल रहा तेल-।
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क्या---मेरा बचपन--
कोई लौटा सकता है--?
क्या,अब मैं,बचपन की तरह,
जी नहीं सकता----
यही है---जीवन का सच,
यही है---परिवर्तन का खेल---।
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---कितने सुहाने थे-----
मेरे बचपन के वो दिन---।
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मौलिक रचना:-अरमो,रायपुर,छ.ग. ।
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व्याख्या:--इस रचना के माध्यम से रचनाकार ने बचपन के दिनों की मासूमियत और बढ़ती उम्र के साथ बदलती घटना को प्रस्तुत करने का एक छोटा सा प्रयास किया है कि मानव जाति के मन में भी ऐसा ही कौतूहल होता है ।
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