स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कवित्त घनाक्षरी { छत्तीसगढ़ी }
शीर्षक--'धरती के भगवान नँगरिया'
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असाड़ के पानी आगे , भिंया के पियास भागे ,
मन म हे खुसी छागे , आनन्द नँगरिया ।
डोली ल हे चतवारे , काँटा-खूँटी ल हे बारे ,
मेंड़ - पार ल सुधारे , जलदी नँगरिया ।।
नाँगर - जुड़ा सजावै , छोल-छाँछ के बनावै ,
डाँडी ल नावा लगावै , 'ठाकुर' नँगरिया ।
बासी-पसिया हे भावै , आमा के अथान खावै ,
मुड़ी म पागा लगावै , सम्हरै नँगरिया ।।१।।
निकारै बैला-भैंसा के , पैरा-भूँसा ल खवा के ,
जुड़ा 'ठाकुर' लगा के , ले चलै नँगरिया ।
खाँधे नाँगर उठावै , हाथे म तुतारी हावै ,
अन्नदाता जे कहावै , देस के नँगरिया ।।
डोली म हबरै जाके , हराई - गाभी बनाके ,
मन - चित ल लगाके , जोतथे नँगरिया ।
'अर्र तत तत' बोले , बैला रेंगैं हौल - हौले ,
आँगर - जाँगर डोले , डोली म नँगरिया ।।२।।
तन म पसीना बोहे , मोती के जैसन सोहे ,
धरती के मन मोहे , ऐसन नँगरिया ।
तुतारी हाथे देखावै , बैला धारेधार जावै ,
बेरा ढरे घर आवै , हमरे नँगरिया ।।
नून-मिरचा म खाथे , अन 'ठाकुर' उगाथे ,
तभे पेट भर पाथे , सबो के नँगरिया ।
भगवान धरती के , पालक हे जगती के ,
सहरी औ देहाती के , जीव के नँगरिया ।।३।।
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व्याख्या--नँगरिया के महिमा अउ खेती-किसानी
के बखान ।
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