Monday, June 15, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कवित्त घनाक्षरी { छत्तीसगढ़ी }
शीर्षक--'धरती के भगवान नँगरिया'
                    ०××××××०
असाड़ के पानी आगे , भिंया के पियास भागे ,
मन म  हे  खुसी छागे , आनन्द         नँगरिया ।
डोली  ल  हे  चतवारे , काँटा-खूँटी ल  हे  बारे ,
मेंड़ - पार  ल  सुधारे , जलदी          नँगरिया ।।
नाँगर - जुड़ा  सजावै , छोल-छाँछ  के  बनावै ,
डाँडी ल नावा लगावै , 'ठाकुर'         नँगरिया ।
बासी-पसिया हे भावै , आमा के अथान खावै ,
मुड़ी म  पागा  लगावै , सम्हरै           नँगरिया ।।१।।
निकारै बैला-भैंसा के , पैरा-भूँसा ल  खवा के ,
जुड़ा 'ठाकुर' लगा के , ले      चलै     नँगरिया ।
खाँधे   नाँगर   उठावै , हाथे  म   तुतारी  हावै ,
अन्नदाता  जे  कहावै , देस      के     नँगरिया ।।
डोली  म  हबरै जाके , हराई - गाभी   बनाके ,
मन - चित ल लगाके , जोतथे          नँगरिया ।
'अर्र   तत  तत' बोले , बैला  रेंगैं  हौल - हौले ,
आँगर - जाँगर  डोले , डोली    म     नँगरिया ।।२।।
तन  म  पसीना  बोहे , मोती के  जैसन  सोहे ,
धरती  के   मन  मोहे , ऐसन           नँगरिया ।
तुतारी   हाथे  देखावै , बैला   धारेधार   जावै ,
बेरा   ढरे   घर  आवै , हमरे             नँगरिया ।।
नून-मिरचा  म  खाथे , अन   'ठाकुर'  उगाथे , 
तभे   पेट  भर   पाथे , सबो    के     नँगरिया ।
भगवान    धरती   के , पालक  हे  जगती के ,
सहरी औ  देहाती  के , जीव    के    नँगरिया ।।३।।
                    ०×××××××०
व्याख्या--नँगरिया के महिमा अउ खेती-किसानी
              के बखान ।

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