जिला :- महासमुंद
विधा :- कविता
अलंकार :- उत्प्रेक्षा अलंकार
शीर्षक :- बचपन
मुस्काता है मुख सदा,
मानो बगीया में सुंदर सुमन।
मानो मनवा हो चंचल पंछी,
छू लेता उड़कर गगन।
नटखट नादान भटकता,
मानो वह हो तितली रंगीली।
रंग भरे हैं जीवन में ज्यों,
आंगन की रंगीन रंगोली।
द्वेश - बैर से कोसों दूर,
मन में रखे हरदम अपनापन।
ज्यों उड़ते जहाज कागज के,
उड़ते उमंग में बचपन।
यारों की टोली ऐसे हो,
ज्यों नभ में हो चांद सितारे।
संग यारों के चमके हरदम,
लगते मोहक, लगते प्यारे।
जीवन अगर हो सुंदर पौधा,
मानो बसंत सा है ये बचपन।
खिले फूल, नव पात है आते,
महके सुंदर उपवन - उपवन।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने बचपन के उस उन्माद भरे लम्हों का वर्णन किया है। कवि ने अपनी कल्पना से बचपन के गुणों की समानता विभिन्न उपमानो में पाए जाने की संभावना व्यक्त की है जिससे कविता में उत्प्रेक्षा अलंकार का अलंकरण हुआ है।
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