रचनाकर-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
विधा- छंद मुक्त
शीर्षक- "प्रेम"
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"प्रेम"
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प्रेम ही शस्त्र प्रेम ही कटार है,
प्रेम ही माधुर्य प्रेम ही मधुर मल्हार है ।
ना जाओ यहां-वहां कहीं और,
प्रेम ही प्रभु का अवतार है।।
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प्रेम से कैसा इन्कार प्रेम ही आविष्कार है
प्रेम से गरजते बादल के बरसने का आसार है ।
जिसने प्रेम को पा लिया,
उसका प्रेम से प्रेममय आत्मोत्धार है ।।
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प्रेम के बाजार में प्रेम का व्यापार है
प्रेम बिन जहां व्यर्थ संसार है ।
प्रेम के ताप से चहुं ओर तपा,
प्रेम बिन ज्वाला भी अश्म-सार है ।।
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मुझ में है भगवान,फिर क्यों दर्प अहंकार है
दुखों से जो द्रवित न हुआ, वह अर्थ ही बेकार है ।
खुद को जानो खुद को पहचानो,
खुद में ही खुद का अनन्य अधिकार है ।।
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प्रेम जीव आधार है,प्रेम ही भव संसार है
प्रेम ही परवरिश,प्रेम ही सदाचार है ।
मानवता में मानव बसा,
बिन प्रेम के हर रिश्ता व्यभिचार है ।।
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
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