स्थान- बनाई,रायगढ़
कविता शीर्षक- "अन्नदाता"
यमक अलंकार- बेर का एक से अधिक बार प्रयोग
बेर- बेला
बेर-समय
बेर- फल
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"अन्नदाता"
अन्नदाता का दिया खाता सारा संसार
उसके श्रम से किसी को नहीं सरोकार
मेहनत कर कर उपजता अन्न
खेत खलिहान में झोंक देता तन
बिना देर किए बिहानिया उठ जाता
हल लेकर सीधे खेतों में जाता
ना उसे सुंदर कपड़ों की चाहत
और ना ही चाहे शहरों की बसाहट
तीन बेर खाने को मिल जाए
जिसके लिए वह खून बहाता
मगर अफसोस अन्न उपजाने वाला
तीन बेर खाके सो जाता
अन्नदाता के घर चूल्हा न जल पाता
किसान को लेना होगा प्रतिकार
भले दुनिया ऐसी की तैसी हो जाए
अन्न ना देने का वचन निभाना होगा
चाहे दुनिया भूखे ही मर जाए
तब हाथ फैलायेगी दुनिया
तब तुझे समझ पाएगी दुनिया
तीन बेर भूखा सोने वाला कृषक
बिना बेर किए अन्नदाता को
सही चरितार्थ कर पाएगा
बहुत ही सुन्दर रचना ।बहुत ही अच्छा लगा ऐसे ही
ReplyDeleteरचनाओं की अपेक्षा मे
धन्यवाद
Bahut khub didi
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