Wednesday, June 3, 2020

छत्तीसगढ़ के महासमुन्द से द्रोपती साहू "सरसिज" की रचना- मनखे

द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"मनखे ल  का होगे"
विधा : छत्तीसगढ़ी कविता (तुकांत)
           *******
दूसर के दुख म रोवइया,दूसर के सुख म हंसैया।
आज मनखे ल का होगे रे,इही मनखे ल का होगे रे। 

इही माटी म बाप बचन बर,
               अपन सुख ल तियागिस। 
भाई के खातिर भरत राम बर,
                राज पाठ ल तियागिस।
आज भाई के बइरी भाई  ...... 
बड़बाय होगे रे ... 
इही मनखे ल ..... 

सन पैंसठ के महादुकाल म, 
               अड़बड़ दुख ल पाइन।
एक मखना के चानी चानी, 
                बाँट के जम्मों खाइन।।
आज घरो घर म झगरा हे .........., 
परोसी अनचिनहार होगे रे .......
इही मनखे ल ........।।

जेन बेटी ल पुरखा मन, 
             भोरहा म भीतराइस।।
उही बेटी बारा भैंसा के,
              बल ल जी दिखलाइस।।
मरदजात ल जनम देवइया ........., 
संग जी अनियाव होगे रे .........,
उही मनखे ल का होगे रे, 
आज मनखे ल का होगे रे, उही मनखे ल का होगे रे।।
                  ************* 
               द्रोपती साहू "सरसिज" 
               

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