महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"मनखे ल का होगे"
विधा : छत्तीसगढ़ी कविता (तुकांत)
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दूसर के दुख म रोवइया,दूसर के सुख म हंसैया।
आज मनखे ल का होगे रे,इही मनखे ल का होगे रे।
इही माटी म बाप बचन बर,
अपन सुख ल तियागिस।
भाई के खातिर भरत राम बर,
राज पाठ ल तियागिस।
आज भाई के बइरी भाई ......
बड़बाय होगे रे ...
इही मनखे ल .....
सन पैंसठ के महादुकाल म,
अड़बड़ दुख ल पाइन।
एक मखना के चानी चानी,
बाँट के जम्मों खाइन।।
आज घरो घर म झगरा हे ..........,
परोसी अनचिनहार होगे रे .......
इही मनखे ल ........।।
जेन बेटी ल पुरखा मन,
भोरहा म भीतराइस।।
उही बेटी बारा भैंसा के,
बल ल जी दिखलाइस।।
मरदजात ल जनम देवइया .........,
संग जी अनियाव होगे रे .........,
उही मनखे ल का होगे रे,
आज मनखे ल का होगे रे, उही मनखे ल का होगे रे।।
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द्रोपती साहू "सरसिज"
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