पता - पेंडरवानी , बालोद , छ. ग.
विधा - मुक्त छंद
शीर्षक - मिटा कर रख देंगें तुझे चीन
कश्मीर से अरुणाचल तक ,
फैला विशाल हिमालय ,
चीन से सेना लोहा लेती ,
बना हिम में आश्रय ,
उपद्रवियों को घुसकर मारे ,
जब -जब जरूरत पड़ी है ,
सीना ताने हिमालय सा ,
दिन - रात सेना खड़ी है ,
एक भी दुश्मन छू न पाए ,
भारत मां की आंचल को ,
आंचल बांधे सिर पर अपना ,
लड़ते होकर घायल वो,
कल्पना का ड्रैगन ,
जब जब तू फुफकारा है ,
लोहे के चने चबाने पड़े तुझे ,
बाघ का दहाड़ हमारा है ,
न डरते हैं हम तेरे -
किसी परमाणु हथियार से ,
सक्षम हैं जवाब देने ,
मान जा तू प्यार से ,
दुनिया में महामारी फैला ,
भटकाने की तेरी चाह है ,
सजग ,सचेत एकजुट खड़ा जग ,
कहीं न तेरी राह है ,
तेरी उत्पादों का बड़ा बाजार हम ,
जब तू बिखर जाएगा ,
खुद तक सिमट कर ,
कहो कैसे ? निखर पायेगा ,
फिर नाचेगा सांप जैसे ,
जब हम बजाए बीन ,
मिनटों में मिटाकर रख देंगे ,
ए मतवाले चीन ,
लड़ने को तैयार न होना ,
बदले की भावना भारी है ,
एक के बदले दस मरेंगे ,
ऐसी अपनी तैयारी है ,
गलवान के शहीदों के ,
खून न जाया जाएगा ,
बात न माने तो घुसकर मारेंगें ,
फिर रोयेगा पछतायेगा ,
हद में रहो , सरहद में रहो ,
जल में रहे ज्यों मीन ,
नही तो मिटाकर रख देंगें ,
तुम्हें ऐ मतवाले चीन ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
Jai hind
ReplyDelete