जिला -कोरबा छत्तीसगढ़
विधा- संस्मरण
शीर्षक- " स्मृति पटल के वो नन्हे नन्हे बालक "
प्रस्तुत है संस्मरण--
सुबह के लगभग छः बज रहे थे , मैं सोकर उठी और अपने घर के प्रमुख गेट पर टिकते हुऐ खड़ी हो गई । सामने आसमान पर सूर्योदय की लालिमा छाई हुई थी , और मैं सूर्योदय का सुनहरा दृश्य देख रही थी । तभी मेरी नजर सड़क की ओर पड़ी । मैंने देखा तीन चार छोटे छोटे बच्चे लगभग 5वर्ष के दिख रहे थे वो मैले कुचैले कपड़े पहने हुए थे वे सभी दौडते हुए सड़क के किनारे बने हुए कूड़े दान में आकर धुस गये । और उसमें पड़े कूड़ा करकट को कुछ इस तरह टटोलने लगे जैसे उनका कोई अनमोल वस्तु उसमें गिर गया हो । वे बच्चे बहुत ही उत्साहित तरीके से बेसुध ढूंढ रहे थे ।
उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं थी कि कूड़े दान में कांटे भी होंगे, कांच के टुकडे होंगे जो उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं ।
तभी एक बच्चे के हाथ में कांच की एक साबुत बोतल मिली , उस बच्चे के मुख पर खुशी की ऐसी चमक दिखने लगी मानो उसके हांथ में हीरा मिल गया हो ।
उस बोतल को वह बच्चा अपने पहने हुए कपड़े से रगड़ रगड़ कर पोछते हुए कूड़े दान से बाहर निकल गया जैसे उसका मकसद पूरा हो गया हो ।
और उसके कुछ ही देर बाद पों पों की आवाज़ बिखेरता सायकिल में एक ब्रेङ वाला आया और उस बच्चे के बगल में खड़ा हो गया । उस बच्चे ने उसे अपनी कांच की बोतल देते हुए बोला बदले में ब्रेङ दिजिऐ ।
और उसे ब्रेड़ दे दिया गया । और वह बच्चा किनारे बैठ कर ब्रेड़ मजे से खाने लगा ।
ये दृश्य देख कर मेरा हृदय विदीर्ण हो गया । हमारे देश में इतनी गरीबी है कि जिन बच्चों को सुबह सुबह स्कूल जाना चाहिए वो अपने भूख मिटाने के लिए ऐसा दुखद प्रयास कर रहे हैं ।
यह तमाम दृश्य मेरे स्मृति पटल हमेशा के लिए अंकित हो गया है ।
।।इति।।
गोमती सिंह, कोरबा छत्तीसगढ़
संस्मरण विधा पर लिखी गई यह लेख पूरी मानवता एवं हमारे समाज की विडंबना है, मनुष्य की इतनी लंबी विकास यात्रा के बाद आज भी ऐसा दृश्य मन को झकझोर कर रख देता है।
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