जिला :- महासमुंद
विधा :- संस्मरण
शीर्षक :- झूठ का डर
बात बहुत पुरानी है, तब मैं शायद आठ साल का था। नटखट सा था उतना ही नादान भी, और दोस्तों के साथ उन्माद से यहां - वहां भागता फिरता था। सुबह उठकर स्कूल जाना वहां से आकर घर में बस्ता रख फिर दोस्तों संग गांव के गलियों में भटकना, बस यहीं दिनचर्या था।
एक बार की बात है हम बच्चों की शैतान टोली ने एक योजना बनाई कि आज शाम स्कूल के बाद हम सभी मछली पकड़ने जाएंगे। घर जाते ही बस्ता रख कर जैसे ही मैं बाहर जाने लगा दीदी ने पूछा "अभी तो स्कूल से आए हो, घर में पांव रखे नहीं की उड़न छू।" मैंने मछली पकड़ने वाली योजना बता दी, यह सुन दीदी ने फटकार लगाते हुए जाने से मना कर दिया। मैंने उन्हें कहा की मछली पकड़ने नहीं जाऊंगा, बस थोड़ा खेल कर आता हूं।
जैसे ही मैं बाहर गया हमारी शैतान टोली इंतजार कर रही थी, हम सब योजना के अनुसार मछली पकड़ने चल पड़े। हम पहाड़ी के नीचे छोटे से छिछले जगह पर गए जहां बारिश के कारण पानी जमा हो गया था। हम सब मस्ती में उस जगह आ गए थे जहां जाने से घरवाले मना करते थे, क्योंकि वहां पर अक्सर गांव वाले कांच के टूटे - फूटे सामान फेंक दिया करते थे, मगर हमें क्या है, हम तो अपनी मस्ती में थे।
सभी मछली पकड़ने के लिए पानी में कूद पड़े तभी मुझे पांव में कुछ चुभ गया, मैं असहनीय पीड़ा से बिलख उठा। जब पांव उठाकर देख तो कांच का टुकडा पांव में चुभ गया था। मैं वहीं बैठकर रो रहा था, अश्रुधारा ऐसे उफान ले रही थी मानो बारिश के बाद गंगा नदी उफान पर हो। और जले पर नमक छिड़कने का काम तो इस सोच ने किया जब मन में खयाल आया कि घर वालों को पता चलने पर खूब धुनाई होगी। और मैंने घर न जाने का मन बना लिया, लेकिन दोस्तों ने जाकर दीदी को बुला लाया, दीदी को आता देख मैं डर में वहां से भाग जाना चाहता था लेकिन क्या करूं पैर चोटिल था, और मैं उसहाय।
दीदी ने गोद में उठाकर मुझे घर लाई, पापा डॉक्टर के पास ले गए, सुई लगवाने के बाद कड़वी दवाई खानी पड़ी, साथ ही खाने पड़े घर वालों के डांट। तब से मैंने मन में यह गांठ बांध ली है कि जो भी काम करो बता कर करो क्योंकि झूठ का दर्द बहुत ही असहनीय है।......
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