Monday, June 22, 2020

रायगढ़ से पुष्पा पटनायक की रचना- दुनियाँ का दस्तूर

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छन्द मुक्त कविता(यमक अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"दुनियां का दस्तूर"
********************
            (1)
रिश्ते अजीबोगरीब हैं
समझ न आया करते हैं
कांच जैसे टूटते 
जोड़े जुड़ा नहीं करते हैं 
           (2)
माथे थोड़ा बल पड़े 
कुरूपता चली आती है
संभालो जरा वार्ना 
चेहरे उतर जाया करते हैं 
         (3)
लंबे अरसे से यहां 
बहू रोटी पकाती है 
पर सासें हैं कि हमेशा 
बहु सुनाया करते हैं 
        (4)
बिहाई बेटी घर आ बैठे 
मां बाप का मन दुखता है
अपने भी गैर हो जाते 
समाज में बहु सुनाई पड़ते हैं  
         (5)
समाज का ना पूछो जी
करते गुनाह सारे हैं 
मतलब निकलते ही 
इल्जाम थोपा करते हैं 
         (6)
ज़िद्दीे होते लोग बड़े 
तेज सांसे चलाना जानें
मन के बुरे नहीं होते
अपनों को सताया करते हैं 
        (7)
परिस्थितियाँ खराब है 
गुस्सा जल्दी आ जाता 
मन का कुछ न होता तो 
ख़ुद बड़बड़ आया करते हैं 
        (8)
पुष्पा की नज़र पड़ी 
दुनिया के दस्तूर पर 
मन दुखी हुआ पर 
खुद को समझाया करते हैं

*********************
यमक अलंकार -बहु(बेटे की पत्नी, ज्यादा, अधिक) सांसे(पति या पत्नी की मां, श्वांस)

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...