जिला कोरबा छत्तीसगढ़
विधा-कविता
शीर्षक " अहंकार "
प्रस्तुत है कविता-
लाख धुतकारती हूँ मैं इसे ,
फिर भी दबे पाँव आ जाता है ,
कहते हैं- कार से इसका नाता है ,
मगर कार तो कई होते हैं!
इक होता उपकार मगर,
अहंकार इसको कहते हैं ।
।। इति।।
गोमती सिंह
ब्याख्या- प्रस्तुत कविता में रचनाकार ये कहना चाह रही है कि अहंकार कैसे मानव मस्तिष्क में घुस जाता है । अहंकार से बचने के लिए निरंतर स्वयं के स्वभाव का चिंतन करते रहना पड़ता है ।
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अहंकार शिर्षक पर कवियित्री मनुष्य के अंनर्तमन में छुपी दुर्रभावना से स्वयं को सचेत रहने का आग्रह करना चाहती हैं
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