जिला:- महासमुंद
विधा:- कविता
रस:- विभत्स
शीर्षक:- अहंकार चकनाचूर हुआ।
अहंकार अशोक का,
हुआ तब चकनाचूर,
मोम सा पिघला हृदय,
था जो अब तक निष्ठूर।
लौटा जो युद्धोपरांत,
कलिंग की रणभूमि में,
बह रही थी जहां खून की नदियां,
शोकाकुल समर भूमि में।
जाने कितने कटे सिर से,
रक्त निकल कर जम रही थी,
अंतड़ियां बिखरी पड़ी थीं,
सांसें कितनी थम रही थी।
कितने ही चील और गिद्ध वहां,
बैठे लार टपकाते थे,
ज्यूं ही जान छूटती तन से,
आंखें नोंच ले जाते थे।
देख मार्मिक दृश्य समर का,
मन राह त्यागने को मजबूर हुआ,
चित्कारें सुन अधमरों का,
अहंकार चकनाचूर हुआ।
व्याख्या:- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने अशोक द्वारा लड़े गए अंतिम युद्ध ( कलिंग के युद्ध) के विभत्स दृश्य को चित्रित किया है जिसे देखकर अशोक का मन बदल गया और युद्ध जीतने का अहंकार चकनाचूर हो गया।
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