जिला_जांजगीर_चाम्पा
राज्य__छत्तीसगढ़
विधा---कविता
शीर्षक---मानव तेरा शरीर
व्याख्या____प्रस्तुत कविता में कवि द्वारा जीवित शरीर के क्रिया कलाप अमानवीय व्यवहार एवं मृत शरीर के दशाओं का वर्णन किया गया है ।
***********************************************
मानव तेरा शरीर
मानव तेरा शरीर देख,आज जिस हाल में ।
चला गया न अहंकार तेरा,काल के गाल में ।
प्रकृति विनाश का , ऐसे बीज बोता है ।
वह जैसा चाहता है,वैसी यहां होता है ।
हर कोई उलझता यहां, उसके हर सवाल में ।
उदण्ड था बलवान था, ताकत का तुझे घमण्ड था ।
इसलिए मतिमंद था, सबसे निर्भय स्वच्छंद था ।
ये पाती हैं दशाएं तन, यहां फैले उसके जाल में ।
तेरे शरीर तो मिट रहे,तू न इसे तो देख रहे ।
देख मन चित्कार रहा, ऐसे ओ समेट रहे ।
यही दिन रात होता,माह भी और साल में ।
तन से तेरे रक्त बहते,कांपते जीभ ये कहते ।
खा रहे सियार गिद्ध,मस्त होकर यही रहते ।
आंख कान हाथ पैर,अस्थि मज्जा दिखते बिकराल से ।
न देखा जा रहा ,न कहा जा रहा है।
मन घृणा की धार,अविरल बहा जा रहा है ।
ऊ छोड़ सारे चर्चा अब, रहूं अलग माहौल में ।
गिरधारी लाल चौहान
No comments:
Post a Comment