स्थान-खरसिया
जिला-रायगढ़
शीर्षक "-मानुस तन पाके तैं काबर इतराय "
विधा-गीत
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मानुस तन पाके तैं काबर इतराय
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मनखे हर तो हीरा जनम ये,
गियान बुध तोर तन म गा।
लोभ, घमंड ईरसा खा डारिस,
आगी लगे हे तोर मन म गा।।
मुख म राम बगल म छुरी,
तैं, अबिरथा जनम गँवाय...।।
सत धरम ल छोड़ के भाई,
तैं करथस दुनिया दारी गा,।
मनखे ल मनखे नाच नचावे,
बरकस हर बने मदारी गा।।
अइसन तोर जिनगानी बीतय,
हरि सुमिरन तैं हर भुलाय..।।
जेन रद्दा म झन जा कहे ले,
उही रद्दा म तैं हर जाथस जी।
कहे बोले ल नइ मानस तैं,
खूँटा म जा हपचाथस जी।।
अब्बर-जब्बरआज के मनखे,
मुड़ धरे करम ल ठठाय..।।
धन दोगानी मिले हवय तोला ,
काबर तैं हर बौराथास गा ।
अब्बड़ घमंड हो जाथे तोला,
धन बल म उधम मचाथस गा।
आही अइसन समे रे ,संगी,
कछु काम कोनो नइ आय..।।
माया मोह म फँसे हे मनखे,
मोर-मोर तैंहर कहिथस गा।
तोर-मोर घलो काम नइआवे,
काकर भरोसा म रहिथस गा।।
सुंदर काया तोर भरे जवानी,
सबो माटी म गा मिल जाय..।।
||||||गुलाब सिंह कंवर गुलाब
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