*महासमुन्द*
*विधा*:- *कविता*
नदियाँ
बहती नदियों में शीतल जल,
कलरव करती कल- कल- कल,
बहती जाए वह चंचल,
राही की प्यास बुझाती है।
धरा को करती उर्वरा,
कर्जदार है उसकी जर्रा- जर्रा,
है उपकार से उसके, जग हरा- भरा
जग सिंचित कर जाती है ।
है श्रृंगार वसुधरा की, देन उसकी,
है ममतामयी माँ, उपमान जिसकी,
है आत्मा की मुक्तिमार्ग सबकी,
नित नव पाठ सिखलाती है।
कर फतह हर बाधाएँ,
गुण कितने निज में समाए,
अविरल वो नित बहती जाए,
सागर में मिल जाती है।
*व्याख्या*:-
उक्त पंक्तियों में कवि ने नदियों का वर्णन करते हुए कहा है कि नदियाँ सदैव ही कलकल के संगीतमय धून में, शीतल जल को साथ ले बहती है। वह बहुत चंचल - चपल है लेकिन हर राहगीर की प्यास बुझाती है। वह नदियाँ ही है जो धरती की उर्वरता को बढ़ाती हैं, कण - कण जिसका कर्जदार है, तथा इन्ही के उपकार से धरती सिंचित हो हरी- भरी रहती है। धरती माँ ने जो नाना प्रकार के अलंकार धारण कर रखे हैं, जिसकी ममता देख हम उसकी तुलना माँ से करते हैं, जो लोगों के इस संसार से मुक्ति का कारण बनती है, और ये नदियाँ ही है जो रोज हमें नई सीख देती हैं। ये नदियाँ ही हैं जो हर मुश्किलों का सामना कर बहती जाती हैं, अपने अंदर जाने कितने ही गुण समेटे रखी है, सदा अविरल बहते रहती हैं, और अंत में सागर में विलिन हो जाती है ।
👏👏
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर कविता ।
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