जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- रेंगत भुइँया नापत हँव
विधा:- कविता
रेंगत भुइँया नापत हँव
मैं भुइँया के सिरजइया मनखे,
रेंगत भुइँया ल मैं नापत हँव।
तुमन सुतव जुड़हा छँइहा,
मैं तिपत भोंभरा तापत हँव।।
महल बनायेंव सड़क बनायेंव,
रद्दा ले काँटा मैं तिरयायेंव।
खिरगे जिनगी तुँहर बर मोर,
खुद बर काँही नई सिरजायेंव।।
सुख बगरायेंव जम्मो झन बर,
खुद बर दुख के खाँचा खापत हँव।
मैं भुइँया के सिरजइया मनखे,
रेंगत भुइँया ल मैं नापत हँव।।
परगे फोरा रेंगत गोड़ मोर,
अंग अंग झाँझर परगे।
कइसन सुख ए बैरी हर,
काबर मोर बर कम परगे।।
छर्री दर्री होगे मोर जिनगी,
भइगे जिनगी ल अब काटत हँव,
मैं भुइँया के सिरजइया मनखे,
रेंगत भुइँया ल मैं नापत हँव।।
का भारी अलहन होगे मोर ले,
जनम धर ये दुनिया म?
थोरक हक तो मोरो होही।
इँहा टुटहा फुटहा कुरिया म।।
जिनगी काटे आये रहेंव मैं,
अब हपटत रद्दा काटत हँव।
मैं भुइँया के सिरजइया मनखे,
रेंगत भुइँया ल मैं नापत हँव।।
देख डारेंव दोगलाई कपट मैं,
हमर गरीब के पीरा बर।
तुँहर आँखी टकटक दिखथे,
अमीर बाप के हीरा बर।।
झन भुलवारव अब तो मोला,
सबके करनी मैं हर भाँपत हँव।
मैं भुइँया के सिरजइया मनखे,
रेंगत भुइँया ल मैं नापत हँव।।
रेंगत भुइँया ल मैं नापत हँव।।
नागेश कश्यप।।
व्याख्या-
वर्तमान परिवेश के बेरा म लॉकडाउन के चलत प्रवासी मजदूर जऊन रेंगत रेंगत सइकड़ो किलोमीटर दुरिहा ले अपन घर कुरिया म आवत हे उँखर मन के पिरा ल ये रचना के माध्यम ले बखान करे के एक छोटकुन प्रयास करे हँव।
गरीब बनिहार अपन अंतस ले कहत हे के, ये भुइँया के उबड़ खाबड़ टेड़गा बेड़गा रद्दा ल मोटर गाड़ी रेल चले बर मैं चतवारेंव आज ओही भुइँया म मोर बर मोटर गाड़ी कम परगे जऊन मैं अतेक दुरिहा ले रेंगत अपन घर जावत हँव, अउ तुमन सेठ साहूकार मन अपन घर के छइँहा म सुरतावत रहव मैं इँहा जरत घाम ल आगी बरोबर तापत हँव।
जम्मो पंक्ति म भाव, व्याख्या स्पष्टीकरण हे।
बहुत बढ़िया
ReplyDeleteभाव विभोर भावुक कर देने वाली पंक्ति है।
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