राजस्थान
मैं भी
ऐ पिंजरे के पंछी,
समझती हूं तेरा दर्द मै भी।
घुटता हैं, जैसे तु ,इन लोहे की दीवारों में,
वैसे हीं, इन पत्थर की दीवारों में,
घुटती हूं मै भी।
मचलता हैं जैसे तु आसमान में उड़ने को
वैसे ही ,खुली हवा में जीने को,
मचलती हूं मैं भी।
कहता हैं , जैसे तु विनती करके अपनी दास्तान,
वैसे ही, बदल जा तु हे इंसान,
कहती हूं मै भी।
ऐ पिंजरे के पंछी
समझती हूं, तेरा दर्द मैं भी।
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