मध्य प्रदेश
गजल- मीठा ज़हर
मुंसिफ ही नहीं चाहता,हो अम्न शहर में।
गुम हो रही इंसानियत, हर एक बशर में।। १
अब डर नहीं रहा, किसी को कोतवाल का।
अब हो रहीं मनमानियां, बेखोफ नगर में। २
है खोफ़ ज़दा नारी, व्यभिचार देख कर।
शर्म-ओ-हया बाकी कहां कातिल की नज़र में।। ३
वादों पे ये जनता टिकी, वादों की सियासत।
ये ज़िंदगी डूबी हुई है, मीठे ज़हर में।। ४
आसान होगी कैसे , ये राह- ए- ज़िंदगी ।
जब हमसफ़र ही छोड़ दिया, बीच सफ़र में।।५
बेचैन हैं सूखे हुये , शाखों पे परिंदे ।
हरियाली नज़र आती नहीं, देखो सजर में।। ६
अब काफिया रदी फ़ की , सोचो न"अकेला"।
कवि लिख रहे नवगीत कहां, छंद बहर में ।।७
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