शीर्षक-'तुम कहाँ गए'
जिला-कांकेर
विषय-करुण रस
स्थायी भाव-शोक
*तुम कहाँ गए*
तुम कहाँ गए प्राण प्रिय वल्लभ,
सौभाग्य मेरा छीन लिए
जीवन जिऊँ कैसी व्यथा।
छाती पिटती मूर्छित हुई खत्म हुई सारी कथा।
क्रूर विधाता ने चाल कैसे चली,
हिय उठी पीर,त्रास वेदना से भरी।
बीच मंझधार में छोड़ चले,
अब रहूँगी मैं किसके आश्रित।
अंजान जगह भेजती करुण सन्देश,
नम नयनों से कहती प्रीतम संग चलने का दो आदेश।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर ,(छ. ग.)
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