रचनाकार- श्रीमती पदमा साहू,
खैरागढ़,छत्तीसगढ़।
विधा -कविता
*"बच्चों के सिर से उठ गया एक पिता का साया*"
बच्चों के सिर से उठ गया,
एक पिता का साया!
पत्नी के सिर से सिंदूर,
और पति का साया!
ना उम्र थी जाने की,
ना जर्जर थी काया!
बच्चों के सिर...............
छाती पीट-पीट पत्नी रोई,
सिसक- सिसक कर बेटा!
बहु रोई , बेटी रोई,
फुसक- फुसक कर पोता!
भगवान को मंजूर ना था,
परिवार पर पिता का साया!
बच्चों के सिर................
मैं सोचती हूं ठीक हुआ,
जीने ना दिया बुढ़ापा!
इस कलयुग में कमतर है,
माता -पिता की सहायता!
अब क्या सोचे बिगड़ गया,
सब रो- रो पछताया!
बच्चों के सिर..............
पत्नी रोई बच्चें रोएं,
रोएं कुटुम्ब परिवार!
पति नहीं तो पत्नी क्या?
सब कुछ हुआ बेकार!
एक श्रवण है एक राम,
बांकी हुआ पराया!
बच्चों के सिर..............
व्याख्या
इस कविता में एक पिता का महत्व को बताया गया है, जिसके ना होने से बच्चों के सिर से पिता का साया उठ जाता है तो बहुत बड़ी समस्या आ जाती है। और एक पत्नी की सिंदूर जब उजड़ जाती है तो वह निराधार हो जाती है। किसी पिता के निधन होने पर कुटुंब परिवार ,बच्चे, बहू ,बेटी सब रोते हैं।लेकिन जब जिंदा रहते हैं तो कई लोग अपने माता-पिता को दुत्कार देते हैं। इस दुत्कार से तो अच्छा है कि माता-पिता को बुढ़ापा ही ना आए और बुढ़ापा के पहले ही भगवान उसे ले जाए क्योंकि इस कलयुग में सच्ची सेवा करने वाले बहुत कम हैं।
पदमा साहू खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़
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