जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- दाई के मया
विधा:- कविता
दाई के मया
अंगरी धर धर रेंगे ल सिखेंव,
खेलेंव कुदेंव दाई कोरा म।
रस्ता जोहत आँखी पिरागे,
खिरगे जिनगी अगोरा म।।
तोरे सुरता ल दाई,
कइसे भुलावँव ओ।
काला बतावँव मइया,
कहाँ लुकावँव ओ।।
मोरे आँखी ले दाई आँसु सुखागे,
तोर सुरता के निहोरा म।
रस्ता जोहत.........अगोरा म।।
आके मोला दाई,
छाती म लगाले ओ।
मोर हिरा बेटा कइके,
अँचरा म लुकाले ओ।।
जिनगी मोला छेदत हे दाई,
अंधियारी के घनघोरा म।
रस्ता जोहत.........अगोरा म।।
दाई तोर मया मैं तो,
काबर नई पायेंव ओ।
अइसे अभागा जिनगी,
धरके मैं आयेंव ओ।।
महु ल कोनो दाई बेटा ओ कहितिच,
लुका लेतिच ओ कोरा म।
रस्ता जोहत.........अगोरा म।।
दुनिया मोला ताना मारे दाई,
अँगरा धर के भूँजत हे।
तोर गुरतुर बोली ह मइया,
छीन छीन मोला गुँजत हे।।
कलपत हौं दाई तोरे बिना ओ,
भरे हे दुःख मोर झोरा म।
रस्ता जोहत...........अगोरा म।।
तोर बिना अध्धर जिनगी,
मोर छाती फाटत हे।
जिहाँ जाँव तेन मेर मोला,
बिन दाई कस छाँटत हे।
जिनगी ल मोर झोंकत हे दुनिया,
चना गँहू कस होरा म।
रस्ता जोहत.........अगोरा म-2।।
व्याख्या-
ये रचना के माध्यम ले लेखक ह, एक झन 5, 7 बच्छर के बिन दाई के लइका के पीरा ल दर्शाये के एक छोटकुन प्रयास करे हे, लइका ह जइसे ये संसार ल जानिस समझिस त अपन दाई के सुरता करत रोवत बिखलत कहत हे के, दाई तोर अंगरी ल धर धर के मैं ह ये भुइँया म रेंगे ल सिखेंव, तोर अँचरा के छाँव म तोर कोरा म खेल खुद के बाढ़ेव, फेर काबर दाई मोला छोड़ के ये संसार ले चल देस, तोर अगोरा म दाई रस्ता देखत देखत दाई आँखी पिरागे गे हे आके मोला दाई छाती ले लगाले.। ये प्रकार ले लइका ह रो रो के बिलाप करत हे।
जम्मो पंक्ति के भाव अही प्रकार स्पष्टीकरण हे।।
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