जिला- कोरिया, छत्तीसगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- "मां की महिमा"
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बलिहारी है अपनी सन्तान पर, मां के जैसी कोई बलिदानी नहीं ,
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं ।
मां गुरु, मां गोविन्द, मां के जैसी कोई सयानी नहीं,
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं।
अनुपम, अद्वितीय संसार में मां, इसकी कोई सानी नहीं,
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं।
किसी देश, काल, परिस्थिति में, इतनी कोई सुहानी नहीं
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं।
इतना संस्कारित, इतना पावन, इतना कोई ज्ञानी नहीं,
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं।
बहुत सरल, बहुत उदार, लेशमात्र भी अभिमानी नहीं,
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं।
कितनी निर्मल इसकी गौरव गाथा, कौन कहेगा मां एक अमर कहानी नहीं,
वात्सल्य जितना इसके ह्रदय में, समन्दर में उतना पानी नहीं।
बिजेन्द्र अहीर
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