जिला :- सूरजपुर, प्रेमनगर
विषय :- मजदूर
विधा :- ग़ज़ल
बहर :- फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन
122 122 122 122
काफिया :- हर
रदीफ़ :- का आरा
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चले थे बसाने, शहर का नज़ारा,
*बने कौन मेरे सफ़र का सहारा....*
गया आज भूखे सड़क में धकेला,
*सहूँ आज तेरे कहर का इशारा....*
बिलखते तड़पते सड़क में चले थे,
*दिखाऊँ किसे मैं नज़र का नज़ारा....*
दिलाता रहा रोज़ झूठी दिलासा,
*अभी दूर थोड़ा शहर है हमारा....*
मगर जंग जीवन नहीं जीत पायी,
*मिला भूख को ना जहर का सहारा....*
चला "सर्द" छूटे अधूरे सफ़र में,
*बड़ा ना समझ ये उदर है हमारा....*
ओमकार साहू "सर्द"
प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
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Great👍, congratulation bhai sahab 🙏💐
ReplyDeleteसमसामयिक घटना पर प्रहार करता प्रश्न
ReplyDeleteअतुल्नीय कार्य काबिले तारीफ भी कम है चूँकि एक ग्रामीण क्षेत्र, पहुँचविहीन होने के कारण भी शानदार काव्य संसद की रचना बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं आभार
ReplyDeleteबहुत बेहतरीन भैया जी आनंद से भर गया दिल.....बेहतरीन रचना👌👌👌👌👌💐💐💐💐
ReplyDeleteवाह्ह वाह वाह्ह सर्द भइया जी लाजावाब समसामायिक रचना भइया शानदार पंक्तियाँ 🙏🙏
Deleteबहुत ही अच्छा रचना सर जी।।।💐💐👌👌
ReplyDeleteवाकई में वर्तमान वास्तविकता से रूबरू कराता हुआ आपका यह गजल है सर जी
ReplyDeleteMarmasparshi rachna.majduro ki wartman paristhiti ka anukarniy chitran.
ReplyDeleteGreat bhaiya... U r always Adorable ...
ReplyDeleteबेहतरीन रचना
ReplyDeleteबहुत सुंदर सर जी,
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना है,महोदय...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर सर
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