जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-दिहाड़ी मजदूर
रस-करुण रस
अलंकार-उत्प्रेक्षा
आस लिए बड़ी दूर गये
रोजी-रोटी की तलाश में
ज्यों भटकता है चकवा
पावस नीर की आस में।
पसीना बहा पत्थर तोड़ें
अट्टालिकाओं के ईंट जोड़े
भूखे पेट कई रात सोये
मानों कोई उपवास होये।
चंद पैसे बचाये रखें
ज्यों अभावों की सांझ में
करोना का कहर ढाया
त्यों भूख और प्यास में।
कहीं रेल पटरी में कुचले गए
कभी ट्रक के पीछे ठूंसे गये
मानों नव जीवन की चाह लिए
भटक गये दुरुह राह में।
घर पहुंचने की चाह में
दर -दर भटकते आस में
पैर में छाले भूखे -प्यासे
चले अभावों के घास में।।
व्याख्या-
मजदूर अपने परिवार के लिए घर से दूर जाकर कठिन परिश्रम करता है, पर कमाये गये चंद पैसे भी जीवन की चाह में गंवा कर घर लौटने की कोशिश करता है।
मीरा आर्ची चौहान
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