जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- बिन परख के बुता
विधा:- सोरठा छंद
बिन परख के बुता
मनखे बिना सोच, करथे अइसे काम जी।
अंतस पर के नोच, करथे बड़ा अराम जी।।
रट ले कतको ज्ञान, धन के गठरी बाँध ले।
जग म नई हे मान, दगा लबारी बाँट के।।
अंतस अपने तोर, हव जिनगी ला कतरही।
पर के आँखी फोर, हाँ कइसे सुख बगरही।।
जिनगी दिन हे चार, मया दया ला जान ले।
भव ले होबे पार, जनम मरन पहचान ले।।
हरियर जिनगी देख, होही सार तभे इँहा।
पर के पिरा सरेख, दया धरम बँटही तिहाँ।।
व्याख्या -
ये रचना के माध्यम ले मैं जम्मो झन ल ये बताना चाहत हँव के, ये संसार म कतको मनखे अइसे हे जऊन बिना सोचे समझे, आघु वाले मनखे ल बिना परखे बिना ओखर कसूर के ओला कसूरवार ठहरा देथे, अउ ओला दुःख के दहरा म ढ़केल के खुद निंद भर चैन से सोथे,
फेर ओखर अइसन करनी ले ओखरे अंतस ह ओला रात दिन कतरत रइही, दुसर ल दुःख देके ओखर खुद के जिनगी म सुख नई बगरय।
अउ ओ चाहे जतका ज्ञान बटोर ले अउ धन दौलत ल जतका जोर ले, दगा लबारी छल कपट करके संसार म कोनो मेर मान सम्मान नई मिले..जम्मो पंक्ति के भाव स्पष्टीकरण हे..सादर.🙏🙏🙏
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