जिला - महासमुन्द
विधा- मुक्तक
शीर्षक - प्रेम परिभाषा
भाव - रति
चलो इस बार लिखते हैं,
नई एक प्रेम की गाथा।
मैं तेरा श्याम हो जाऊं,
कि बन जा तू मेरी राधा।
कि कर ले प्रेम को,
फिर प्रगाढ़ इतना हम।
कि मैं तुम बिन अधूरा होऊँ,
तुम मेरे बिन हो आधा।
बंशी की तान मैं छेडूँ,
मन में तेरे नृत्य की अभिलाषा।
चली आना तू मटकी ले,
ले मन में प्रीत की भाषा।
कि रंग देना मुझे आज,
अपने प्रीत के रंग में।
कि गढ़ लें फिर से मिलके हम,
नई एक प्रेम परिभाषा ।।
व्याख्या :- इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने अपने प्रेयसी को संबोधित कर कहता है कि "हे प्रिये आओ प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ते हैं, जिसमें मैं प्रेम की मूरत श्याम बन जाऊं और तुम मेरी राधा बन जाओ। हमारा प्रेम इतना गहरा हो की हम एक दूजे के बिना अधूरे हो जाएं । मैं तुम्हारे मनमोहक नृत्य की अभिलाषा ले बंशी बजाऊं और तुम प्रेम की बोली ले मटकी लेकर मुझे अपने प्रीत के रंग में रंग लो। और इस तरह से हम दोनो मिलकर प्रेम की एक नई परिभाषा दें।
अतिउत्तम
ReplyDeleteGjb
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