जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- जिनगी के पैडगरी
विधा:- कविता
जिनगी के पैडगरी
जिनगी के पैडगरी म संगी,
ऊबड़ खाबड़ रेंगे ल परही।
ऊँच निच अऊ डबरा डिलवा,
गिर गिर खुद संभलना परही।।
सुख के साथी बँहुते मिलही,
दुःख म दुरिहा छिदबिद होही।
तोर करम के रोना जँहुरिया,
अपन आँखि म कोन रोही।।
करम के दीया तोर अइसे बार,
सबो जगह ओला बरे ल परही।
जिनगी के..........रेंगे ल परही।।
झन सोच तैं, झन बिचार संगी,
जऊन होना हे ओही होही ।
उप्पर वाले तोर जिनगी म एकदिन,
सुख के बिजहा खच्चित बोही ।
दुःख के आँसु कहूँ रोवत रइबो,
त फेर धीरज ल कोन धरही।
जिनगी के..........रेंगे ल परही।।
भरम के बैरी नदिया म,
मोह के डोंगा खेवत हच।
छन्नी म तैं दूध दूहे अऊ,
करम ल दोष देवत हच।
अपन करम के भुगतना संगी,
हमला खुद भुगतना परही।
जिनगी के..........रेंगे ल परही।।
का होगे तोर आघु म आज,
बिपत के अँधरी छाये हे।
कतको मनखे भरे परे हे,
जऊन दर दर ठोकर खाये हे।
बाँध के रखबे मन ल तँय हर,
त अँजोर ओला करे ल परही।
जिनगी के..........रेंगे ल परही।।
: व्याख्या-
ये रचना म रचनाकार ये बताना चाहत हे के, जीवन रूपी रद्दा म डबरा डिलवा सुख दुख हानि लाभ ये जम्मो ल सह के रेंगे ल परथे, अउ तोर मेरन सुख के साधन अपार हे त तोला कतको संगवारी मिल जाही, अउ ओही संगवारी मन दुःख के बिपत के बेरा म तोर ले तिरिया जाथे..ये प्रकार ले जम्मो पंक्ति के भाव लिए रचना स्पष्टीकरण हे.।
वाह बहुत सुंदर बताय हो भाई
ReplyDeleteगज्जब
ReplyDelete