स्थान- आमगांव (तमनार )
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
शीर्षक - मजदूर
विधा - छंद मुक्त
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जहां के दुखों को उठाने मजबूर मैं हूं,
मैले-कुचैले कपड़ों में थोड़ा मशहूर मैं हूं ।
इस महामारी से कैसे मर जाऊं यूं ही,
कालचक्र को चलाता खुदा का नूर मैं हूं ।।
शिथिल हो गया दिवाकर तो प्रभावी शाम मैं हूं,
रखो संभालकर पेड़ों को तपती घाम मैं हूं ।
ठेले में मेले में कहीं कूड़ा उठाते देखा होगा तुमने,
गली चौराहों की हॅंसती सुबह शाम मैं हूं ।।
भूख के विवशता की आह मैं हूं,
वृद्ध पिता की परवाह मैं हूं ।
कोई पैमाना नहीं ऐसा जो मेरा वजूद नाप ले,
किसी दुखिया के नमकीन नदियों की प्रवाह मैं हूं ।।
मां की सूखी रोटी का निवाला मैं हूं,
दुखों को पी जाने वाला वो मधुशाला मैं हूं ।
मेरी ही मेहनत से खड़ी है ये ऊंची मीनारें,
देखो तो उस जटाधारी शिव का शिवाला मैं हूं ।।
ठंड से ठिठुरते बूढ़िया की शाल मैं हूं,
मां के सिक्के का गांठ वाला रुमाल मैं हूं ।
दुनिया अपने गमों पर रोने लगती है,
दुखों के मंजर में मुस्कुराता कमाल मैं हूं ।।
गंदे कपड़ों पर भी इतराता मैं हूं,
वहीं दुनिया,वहीं से, फिर वैसा ही दोहराता मैं हूं ।
कोई ख्वाहिश नहीं मेरी मखमली सेज का,
इसी चारपाई पर श्मशान में अग्नि दाता मैं हूं ।।
बेजान खून से लथपथ भूख से चूर मैं हूं,
मीलों सफर तय किया पर बच्चों से दूर मैं हूं ।
संगमरमर के महल में तुम चैन से रहना,
पर याद रखो अध:तल में दफ्न कोई मजदूर मैं हूं ।।
गुलशन_खम्हारी
आमगांव-तमनार
Bahut hi achchi rachna hai.. निःशब्द
ReplyDeleteBahoot hi sunder rachna hai sangi g
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