रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक -- मजदूर
विधा -- सरसी छंद (करुण
रस , उत्प्रेक्षा अलंकार )
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खेतों में उपजाऊँ दाना ,
मैं तो हूँ मजदूर ।
खाने को पड़ते हैं लाले ,
मैं तो हूँ मजबूर ।।
श्रम करता हूँ बेघर भूखा ,
ये कैसा दस्तूर ।
रहते हैं राज घरानों में ,
श्रम से जो हैं दूर ।।१।।
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ठंडी गरमी बारिश भारी ,
काज करे दिन रात ।
हर मौसम से यारी अपनी ,
कभी करे ना घात ।।
खेतों में खलिहानों में भी ,
करे करम की बात ।
मिल में खान खदानों में भी ,
जागे सारी रात ।।२।।
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हालातों से कर समझौता ,
जीने को मंजूर ।
रह कर भूखा जीवन जीना ,
बडा़ हुआ नासूर ।।
ऋण में जीना ऋण में मरना ,
तन मन चकनाचूर ।
हर क्षण हर पल शोषित होता ,
सुख मन से है दूर ।।३।।
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पत्थर से पानी निकलाते ,
नीर बिन्दु की खान ।
पानी जब तन से छलकाते ,
माटी उपजे धान ।।
श्रम साधन से मरु धन उपजे ,
बढे़ भूमि की मान ।
मनमोहक उपवन फुल तरुवर ,
बढे़ धरा की शान ।।४।।
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पत्थर से मूरत गढ़ देते ,
कला बने पहचान ।
पर्वत समतल श्रम कर देते ,
रत्न करे पहचान ।।
सागर तल से मोती लाए ,
गुप्त अजब ये जान ।
पथ से नव पथ गढ़ गढ़ कर ही ,
बढे़ कर्म का मान ।।५।।
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व्याख्या :---
प्रस्तुत छंद में हमने मजदूर की करुण दशा को उत्प्रेक्षा अलंकार की छंटा से सरसी छंद के माध्यम से मनोहर चित्रण रने का एक छोटा सा नव प्रयास किया है ।।
Superb
ReplyDeleteक्या बात है ठाकुर जी
ReplyDeleteबधाइयां