०१. रचनाकार का नाम:- स्नेहलता "स्नेह"
०२. जिले का नाम+(छत्तीसगढ़) -सरगुजा छ.ग.
०३. शीर्षक:-"सैन्यबल"
०४. विधा:-आल्हा छंद(वीर रस)
ओ आतंकी अपनी मां का दूध करे का है धिक्कार |
तूने रक्त बहाया जिनका उसकी मां को नमन हजार ||
आतंकी कीड़ा नाली का थूके तुझ पर यह संसार |
तेरा अंत समय है आया अब होगी जमकर यलगार ||
घर घुस कर मारेंगे तुझको खुल्लम-खुल्ला है ललकार|
दम बाजुओं में है इतना ,नहीं चाहिए अब हथियार ||
नाखूनों से आँतें फाड़े हम हैं नरसिम्हा अवतार|
कालचक्र की मांग यही है यम के दूत करे चित्कार||
बहुत हो चुका अब ना सहेंगे ठोस फैसला ले सरकार |
रणभेरी बजने दो अब तो रणचंडी भी है तैयार ||
बदला लेंगे सर काटेंगे,कहता लुटा हुआ सिंदूर |
राखी चीख चीख कर कहती कर दो दुश्मन चकनाचूर||
कफन बांधकर घर से निकले आंखों में है जिनके नूर|
देश प्रेम जिनके रग बहता, रक्षा करना रहा फितूर ||
दुश्मन को औकात दिखा दे शूरवीर भारत के लाल|
धूल चटा देंगे पल भर में खींच उतारे सारी खाल||
ध्वस्त करे नापाक इरादे पल में होगा दुश्मन ख़ाक |
सारे समझौते अब तोड़ो आतंकी की काटो नाक||
स्नेहिल भाषा समझे कैसे आतंकी सारे लतखोर |
रब के बंदे कहते खुद को सब के सब हैं आदमखोर||
कब्र तले ही दब जाएगा,इक दिन पूरा पाकिस्तान|
अमर रहा है अमर रहेगा ,कालजयी है हिंदुस्तान||
व्याख्या मेरे शब्दों में- *आल्हा*
वीर रस व अतिश्योक्ति वाला छंद होता है। इस छंदबद्ध रचना में सिपाहियों को हथियार की आवश्यकता नहीं है बताया गया है और उनके नाखून ही काफी हैं अर्थात वे रण में नरसिम्हा अवतार के रूप में होते हैं. साथ ही आतंकी को मनुष्य नहीं वरन *नाली का कीड़ा* *आदमखोर* की उपमा दी गई है यहाँ उपमा अलंकार का प्रयोग है.यहाँ पर अतिश्योक्ति में यम के दूतों का चित्कार करना, बाजुओं में इतना दम की हथियार की आवश्यकता नहीं,सैनिकों को नरसिम्हा अवतार बताना,पल में धूल चलाना,व खाल खींचना,आतंकी की नाक काटना,कब्र तले पाकिस्तान दबेगा आदि अतिश्योक्ति का प्रयोग किया गया है।
बहुत बढ़िया,वीररस से ओतप्रोत।
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