जिला -बेमेतरा
विधा- कविता
शीर्षक- प्रीत की खिड़की
रोज़ सुबह वह खिड़की पर आती,
एक झलक दिखलाती वो।
जाने क्या जादू कर जाती,
दिन अच्छी कट जाती थी।
फिर सुबह के इंतज़ार में,
उसकी यादों में रातें भी कट जाती थी।
रोज़ सुबह वह खिड़की पर आती,
एक झलक दिखलाती थी।
बहुत दिनों तक चला यही सिलसिला,
मन हुआ बेचैन।
और एक शाम को मै,
वहां चला मै बेचैन।
हाथ में था पत्र मेरे,
और मन था विश्वास।
अब भी मिलेगी खिड़की पर वह, ऐसा था विश्वास।
विश्वास मेरा जीत गया,
दिख गई उसकी एक झलक।
पत्र उसको दिखलाकर,
चला गया वहीं रख कर।
फिर सुबह के इंतज़ार में,
रात मेरी काटती नहीं।
आज सुबह खिड़की पर उसकी,
एक झलक दिखी नहीं।
थोड़े ही देर में कानों में मेरे,
आवाज़ पायल की आने लगी।
मेरे सामने खड़ी थी वो,
जिसको तकता था दूर से मै।
देखता ही उसे मै रह गया,
बात अपनी वो कह गई।
इसतरह शुरू हुआ हमारे,
मिलने का फिर सिलसिला।
फिर हम मिलने लगे,
रोज़ युंही छुप छुप कर। फिर एक दिन दोनों में हुआ,
इजहार ए मोहब्बत।
फिर हम दोनों बंध गए,
विवाह ए बंधन।
सूर्य प्रकाश पाटिल
उत्कृष्ट रचना मित्र ।
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