Thursday, May 21, 2020

छत्तीसगढ़ के गुलाब सिंह कंवर"गुलाब" की रचना- व्यथा मजदूरों की

रचनाकार -गुलाब सिंह कंवर"गुलाब"
स्थान-,खरसिया
जिला-रायगढ़
शीर्षक-"व्यथा मजदूरों की"
व्याख्या- नालाक डाउन में  मजदूरों की स्थति बहुत खराब है अपने जन्मभूमि जाने के लिए  गाड़ी व्यवस्था आदि न होने के कारण देश भर में स्थिति बेहद चिंताजनक है। पैदल चलते पांव में छाले, पड़ गए हैं खाने पीने रहने की चिंता न करते हुए बदहवास अपने गांव ग्राम पैदल निकल पड़े हैं।
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मजदूरों की व्यथा
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पांव में छाले,
खाने के लाले,
हो गए हैं मजबूर।
बेबसी,जिल्लत,
ये जीवन किल्लत,
जी रहें मजदूर।।


महिला, बच्चे,
और सयाने,
लक्ष्य अपना
मंजिल पाने।
चल पड़े हैं दूर।
कहां जाएं, कैसे रहें,
लोग रहे हैं घूूर।।

दे दो रोटी
करो व्यवस्था
सुनो-सुनो हुजूर।
न गाड़ी, छकड़ा
हो रहा लफड़ा
हमारा क्या कुसूर।।

जीने-खाने निकल 
पड़े थे।
मन में सपने 
बड़े-बड़े थे।
हो गया चकनाचूर।

बड़ों-बड़ों की
सब सुनते हैं
गरीबों की कौन सुने।
फायदा नहीं दिखता इसमें
तो कौन अपना सिर धु ने।
यही मजदूरों की दस्तूर।

 गुलाब सिंह कंवर"गुलाब"

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