Thursday, May 21, 2020

छत्तीसगढ़ के जांचगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की कविता

 नाम--गिरधारी लाल चौहान
स्थान---नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला--जांजगीर-चाम्पा
राज्य-छत्तीसगढ़
विधा---कविता
शीर्षक-बस्ती इतनी छोटी सी


व्याख्या--प्रस्तुत कविता में एक छोटी सी बस्ती वहां की साफ सफाई वातावरण का वर्णन किया गया है नायक के द्वारा वहां पहुंचने पर वहां को दुर्गन्ध का भण्डार बताया गया है कष्टों का संसार कहा गया है ।दुर्गन्ध के कारण नाक मुंह सिकुड़ना आंखों हाथ पैर की रक्षा करने की समस्या से भरा है कीचड़ से भरी गलियां है गड्ढों में पानी भरा है मच्छर मक्खी भिनभिनाते दिख रहे हैं एक पल ठहरना वहां मुश्किल है।अब यहां कभी दुबारा नहीं आऊंगा प्रतिज्ञा करने की बात कही गई है । यहां एक पल भी न बिता पाऊंगा यहां के हवा स्थान मानव सभी बदबूदार है । अस्वच्छता भरपूर है ऐसे लगता है जैसे रोगों का व्यापार चल रहा है यहां जीना बहुत मुश्किल है देखने से ऐसा लगता है जैसे कोई यहां यम का पहरेदार खड़ा है । लोगों के चेहरे भी प्रसन्न नहीं दिखाई दे रहे हैं । नहीं यहां चांद का चमक है और न प्रकाश । यहां कोयल के राग भी नहीं है कागों का निवास है कोलाहल भरी जिंदगी है पतझड़ ही पतझड़ के वृक्ष है बहारों का अभाव है।
कोई कठोर मन ही यहां आकर युगों तक निवास करेगा ।
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बस्ती इतनी छोटी सी

बस्ती इतनी छोटी सी,दुर्गन्ध इतना भारी है ।
देख मुंह मोड़ लिया ,ब्यथा दुनियां की सारी है।

नाक मुंह सिकुड़ना पड़़ रहा,आंखों का वही हाल ।
हाथ पैर सम्हाले कैसे, सामने उसका सवाल ।
कीचड़ से भरी गलियां,कई गड्ढे पानी से भरा ।
मच्छर मक्खी भिनभिनाते ठहरने मन हो न जरा ।

अब कभी न आऊंगा यहां, मैंने प्रतिज्ञा  कर डाला ।
घिरा चहुं ओर से यहां ,इधर उधर विष का प्याला ।
अशिक्षा से सभी लबालब, शिक्षित न नजर आया ।
गांव कहूं या शहर इसे, अब तक संज्ञा  न दे पाया ।

बहती हवा यहां का पल पल,एकदम बदबूदार है ।
अस्वच्छता का  भण्डार यहां, रोगों का व्यापार है ।
एक पल मैं न बिता सकूं यहां,जीना दुश्वार है।
 जिधर नजर डालू लगता, खड़ा यम का पहरेदार है।

चेहरा न कोई चांद सा, झिलमिल आंखों में बसे।
राग न कोई कोयल सा, बस कागही काग यहां हंसे ।
वृक्ष न कोई बहार सा,  कंटीले पतझड़ ही दिखे ।
कोई पत्थर मन ही यहां ,आकर युगों तक टिके ।

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