महासमुन्द (छत्तीसगढ़)
चल पड़ी है लेखनी
विधा : छंद मुक्त कविता
आरंभ लो अब समर हो गई,
चल पड़ी है लेखनी।
देखकर जग का चलन,
मूक तोड़ चली है लेखनी ।
ना भीष्म सी है सहनशील,
अब बोल पड़ी है लेखनी ।
ना नेत्रहीन धृतराष्ट्र सा है,
त्रिनेत्र खोल चुकी है लेखनी ।
बाँध रखा था अब तलक जिसे, सारे बंधन तोड़ चली है लेखनी ।
खड़ी अविचल हिमशिखा सी,
पथ पवन का मोड़ चुकी है लेखनी ।
अब तो अविरल सरिता सी बहती,
ना रूकेगी लेखनी ।
शंखनाद जो हुआ समर का,
लो चल पड़ी है लेखनी ।
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*व्याख्या*
इन पंक्तियों में कवि ने लेखनी अर्थात कलम के बारे में लिखा है जो की कलमकार का मुख्य हथियार है । वे कहते हैं कि ज्यों ही कलमकार के मन में द्वंद शुरू हुई है उसके साथ ही कलम रूपी हथियार ने भी युद्ध आरंभ कर दिया है, संसार में बढ़ते अराजकता से उसने अपनी चुप्पी तोड़ ली है। कवि कहते हैं कि लेखनी पितामह भीष्म के समान नहीं है जो अत्याचार को होते देख भी चुप रहे, ना ही वह धृतराष्ट्र सा है अपितु उसने अपने नेत्र खोले रखा है । साथ ही यह भी कहा गया है कि लेखनी ने समाज के सारे बंधन तोड़ दिया है जो अब तक उसे जकड़े रखा है । कवि ने लेखनी की तुलना हिमशिखा अर्थात् हिमालय से करते हुए कहा है कि लेखनी हिमालय की तरह दृढ़ है तथा हर मुसीबत रूपी हवाओं का रूख बदल दिया है तथा लेखनी निडर होकर नदि की अविरल धारा सी बहती जाती है, जो कभी रूकेगी नहीं। अंत में कवि कहते हैं कि चूँकि युद्ध का आरंभ हो गया है तो अब लेखनी निरंतर चलते जाएगी।
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