पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
शीर्षक - मानवीय मूल्य
विधा - दोहे
दोहे
---------------------------------------
हार -जीत कब प्यार में ,
यह ही है आधार ,
जिनमें समर्पण न रहें ,
फिर रिश्ता लाचार।। १।।
अपना -अपना सब कहे ,
घूम ले चहुँओर ,
संकट घर में आए जब ,
तब मिले न ठौर ।।२।।
प्रीत - रीत जान के भी ,
वहमी फिरे इन्सान ,
लेन-देन सम टिक पाए ,
न होत हो बेजान ।।३।।
दया ,प्रेम सब जीव पर ,
जो जन राखे गौर,
कष्ट सहकर रक्षक बनें ,
सो सज्जन कछु और ।।४।।
-- शैलेन्द्र चेलक --
No comments:
Post a Comment