निवास-रायपुर (छ-ग-)
जिला- रायपुर
शीर्षक- बुजुर्ग--
विधा- कविता (मुक्त )
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मैं,अपने परिवार की,
इक मजबूत नींव हूँ,
आज,समय के साथ,
पलकर बन गया हूँ वट वृक्ष
और परिवार रुपी,फैली मेरी शाखायें,
फिर,क्यों आज,बुजुर्ग आँखें,
हैं,कितनी बेबस और लाचार ।
अक्सर,जीवित सन्तानों के रहते,
अनाथों की तरह हो जाते बुजुर्ग,
आज ,कैसे नैतिकता,सामाजिकता
का क्यों हो रहा पतन ,
जरा सोचकर देखो तो यारो ।
जीवन के सफ़र में,बुजुर्ग होते ,
हर परिवार की अनमोल शान ,
जब उनसे मिलते हैं हमें,
तजुर्बों के लाभ,
तब होते हम कितने लाभालाभ ।
किन्तु बुजुर्ग होते ,
परिवार के पके आम,
नई पीढ़ी,कर के इनकी सच्ची सेवा,
अक्सर पा लेते हैं,
परम कर्तव्य-परायणता का पवित्र धाम ।
बुजुर्गो की आदतों में,
अक्सर आ जाता है बचपना ,
हो जाते हैं कभी मन्द-बुध्दि,
तो कभी-कभी बहरे व जिद्दी,
और करते अजीबोगरीब सी हरकतें,
फिर भी,इतना सब कुछ सहकर भी,
जो परिवार करता इनकी सच्ची सेवा,
ये दबे पांव,अपने बच्चों को,
दे जाते हैं अनूठा संस्कारित संदेश ।।
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