Thursday, May 28, 2020

छत्तीसगढ़ के रायपुर से एच एस अरमो की रचना- बुजुर्ग

रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
निवास-रायपुर (छ-ग-)
जिला- रायपुर 
शीर्षक- बुजुर्ग--
विधा- कविता (मुक्त )
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 मैं,अपने परिवार की,
 इक मजबूत नींव हूँ,
 आज,समय के साथ,
 पलकर बन गया हूँ वट वृक्ष 
 और परिवार रुपी,फैली मेरी शाखायें,
 फिर,क्यों आज,बुजुर्ग आँखें,
 हैं,कितनी बेबस और लाचार  ।

 अक्सर,जीवित सन्तानों के रहते,
 अनाथों की तरह हो जाते बुजुर्ग,
 आज ,कैसे नैतिकता,सामाजिकता 
 का क्यों हो रहा पतन ,
 जरा सोचकर देखो तो यारो  ।

 जीवन के सफ़र में,बुजुर्ग होते ,
 हर परिवार की अनमोल शान ,
 जब उनसे मिलते हैं हमें,
 तजुर्बों के लाभ,
 तब होते हम कितने लाभालाभ ।

 किन्तु बुजुर्ग होते ,
 परिवार के पके आम,
 नई पीढ़ी,कर के इनकी सच्ची सेवा,
 अक्सर पा लेते हैं,
 परम कर्तव्य-परायणता का पवित्र धाम  ।

 बुजुर्गो की आदतों में,
 अक्सर आ जाता है बचपना ,
 हो जाते हैं कभी मन्द-बुध्दि,
 तो कभी-कभी बहरे व जिद्दी,
 और करते अजीबोगरीब सी हरकतें,
 फिर भी,इतना सब कुछ सहकर भी,
 जो परिवार करता इनकी सच्ची सेवा,
 ये दबे पांव,अपने बच्चों को,
 दे जाते हैं अनूठा संस्कारित संदेश ।।
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