शीर्षक :- जिनगी अंधियार हे
जिला :- जांजगीर-चांपा,छ.ग.
जिनगी अंधियार हे
हमर जिनगी अब्बड़ अंधियार हे
कोन सुनोइया दुख-पीरा के
कोन देखोइया मोर हीरा के
सब रहत हे अपन ले धुरिया म
धंधाय जम्मोझन कुरिया म
सबे के मुंह म लगे मास्क
देख के अइसन लागथे
आज बने घलो ह बीमार हे
हमर जिनगी अब्बड़ अंधियार हे...
मनखे मन निचट अपखया हे
कोन ल काकर से मया हे
एक दिन लागत हावै एक जुग
ये अलहन ले नइ ए कोनो आरूग
होगे हे सब जतर-कतर
जे ठउर ल देख
सबो कति सफा उजार हे
हमर जिनगी अब्बड़ अंधियार हे...
झन करबे संसो काल काय होही
ये अंधियारी बेरा पहाबे करही
नइ रहै नंगत दिन एहा
लहुठ के अंजोर आबे करही
घर म बइठ के धीरज धर
भले ही आज हे मुँधियार
मगर काल्हि सुग्घर तिहार हे
अब कइसे कहौंव,
हमर जिनगी अब्बड़ अंधियार हे...
- फरूण यादव
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छतीसगढी कविता,बहुत ही अच्छा फरुण यादव जी👍👌
ReplyDeleteAti sundar sir 👌👌👌
ReplyDeleteNice sir ji
ReplyDeleteबहुत सुन्दर कविता है
ReplyDeleteVery nice poem sir ji
ReplyDeleteमुझे और मेरी रचना को आशीष प्रदान के लिए आपका अनंत आभार...✍️🙏
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