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रचनाकार- एच एस अरमो "अरमान "
निवास-बायरन-बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक-"मजदूर बनाम मजबूरी "
विधा--कविता (छ्न्द-मुक्त)
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"मजदूर बनाम मजबूरी "
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मैं था एक मजबूर ,
लाचार-मजदूर,
अपने और परिवार की,
भूख मिटाने--
गाँव,घर-बार है छोड़ा,
दूर परदेश,बड़ा शहर,
अब बना मेरा डेरा ।
मैं और मेरी पत्नि
और थे प्यारे दो नन्हें बच्चे,
किसी तरह,
अपने श्रम के बदले,
कुछ कमा लेता था,
चल रही थी,जीवन की गाड़ी ।
पर अचानक---
भूचाल-सा मेरे जीवन में आया,
कोरोना महामारी का प्रकोप जो छाया,
जब देश में,घोषित हुआ लॉकडाऊन ,
हुक्म हुआ था ऐसा--
घर पर ही रहना--
घर से बाहर ना निकलना ।
हम तो ठहरे मजदूर,
रोज-कमाते ,रोज -खाते,
रहते किराये के,छोटे से मकाँ में ।
धीरे -धीरे दिन गुजरे,
हो गई अब खाने की भारी लाचारी,
सरकारी मदद भी मिलती कैसे--?
राशन कार्ड नहीं था,जो मेरे पास,
भले लोगों ने,बेबसी में दिया कुछ सहारा,
पर मैं बेबस और था एक लाचारा ।
बच्चों की रोती-बिलखती आवाजें,
ठीक से भोजन न मिलने की शुरुआतें,
कब तक ऐसे ही दिन गुजारते ,
पैसों की थी बहुत लाचारी,
श्रमिक के श्रम में--
अब आ गईं थी बेकारी ।
ऐसा लगता मानो--
ये महामारी अब जान लेकर दम लेगी,
पर,मैनें साहस व धैर्य नहीं खोया,
मन ही मन में ठान लिया,
कि,इन कष्ट भरे पलों को,
अब,यहाँ नहीं गुजारुँगा ।
फिर मैं और मेरा परिवार--
निकल पड़े पैदल,
सिर पर गठरी रखे,
पत्नि-बच्चों के साथ ।
मंजिल का मुकाम तय था,
अपना गाँव और वह था,कोसों दूर,
कहते हैं ना लोग--
कि,मरता क्या नहीं करता --?
यही यक्ष प्रश्न---
मेरे सामने मुँह खोले खड़ा था ।
अपनी मंजिल की ओर--
हम बढ़ते चले--चलते-चले,
राह में मिले, कुछ दयावान,
दे देते, कुछ भोजन-पानी ।
पेड़ की छाँव था, अपना ठौर ,
सुरक्षाकर्मी की मिलती रहती दुत्कार,
पर था,मैं मजबूर-बेबस व लाचार,
सुनता फटकार,कभी डन्डे की मार ।
किसी तरह,कईं दिनों के बाद--
पहुँचा अपनी मंज़िल के पास,
सबके चेहरों की,लालिमा थी गायब ,
पर घर के पास,पहुँचने की खुशी थी खूब ।
सरकारी आदेशों ने---
मंजिल के करीब ही हमें रोका ,
सबको 14दिन का वनवास,जो दिया,
कहते उसको सब कोरेंटाईन,
हम अनपढ़,इस बात को ,क्या जाने-?
हमसे दूर रहो,मुँह में कपड़ा ढाँको,
कहीं भी मत थुको--
गाँव बाहर,स्कूल में रहने की सज़ा,
सुविधा के नाम,थी सामान्य व्यवस्था ।
हर दिन-हर रात,हर-पल---
पल -पल बहुत भारी गुजरे ,
कहने को,हम परिवार के साथ थे,
पर मिला था,इक अभिशाप,
रहना होगा,यहाँ दूर--दूर ,
एक-दूसरे को,छु भी नहीं सकते ।
विदेशों से आई,इस महामारी का,
फल जो भुगतना था हमको,
जीवन का नया-नया सबक ,
सीखना था हम--सबको ।
चौदह दिन का जैसे ही वनवास कटा--
चेकअप हुआ-नकाबपोश लोगों द्वारा,
वे दीखते जैसे दूर-ग्रह से आयें हों ,
वे कहते--हो गये कुछ--पॉजिटिव,
और कुछ को कहते--हुये--निगेटिव ।
उनकी बातें,हमको समझ में नहीं आई,
पर,खुशी थी ,इस बात की,
हमारा परिवार था,जाँच में निगेटिव ।
इस शब्द के अर्थ पर ना जाईये--
गाँव में,घर के पास जैसे ही पहुँचे,
पड़ोसी बाहर निकल हमें देख रहे थे,
अपलक अजनबियों की तरह,
कुछ शक की निगाहों से,तो--
कुछ लोग कोरोना मरीज़ के रूप में ।
मेरी कहानी थी-----
एक बेबस--लाचार दीहड़ी मजदूर की-
कैसी लगी---?
मुझ लाचार को,बतलाओगे ना---।
मुझे,उस पल ऐसा लगा था कि--
मैं अपने ही देश में,
पराया हो गया हूँ--?
हे--परमात्मा !
इस तरह की मुसीबतों भरे दिन--
भूल से भी किसी को न दिखाना,
मेरी,आपसे हाथ-जोड़,यही प्रार्थना है ।
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व्याख्या:--मेरे द्वारा प्रस्तुत कविता के माध्यम से एक दिहाड़ी मजदूर की मार्मिक व्यथा को शब्दों में उतारने की कोशिश की है ।ऐसा मेरा मानना है कि आज मजदूर के जीवन में घटित घटनाओं का वर्णन शब्दों में हो नहीं सकता ।
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