Saturday, May 30, 2020

छत्तीसगढ़ के कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- दिहाड़ी

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
       जिला -कांकेर    
 शीर्षक-दिहाड़ी मजदूर

            *दिहाड़ी मजदूर*

मैं दिहाड़ी मजदूर जैसे 
           घनचक्कर का नवरूप,
यहाँ भटकता,वहाँ भटकता, 
                हो जाता कुरूप,
मेरी मेहनत से धरा पर ,
           ज्यौं खिलता कल्प वृक्ष का फूल।

सबकी झोली खुशियों भरता,
                मुझे मिलता अभावों जैसे शूल,
वर्षा, गर्मी, शिशिर  से 
               डरता नहीं बिलकुल।

सारा विकास रुक जाता है 
               मेरे बिन जरूर,
विपत्ति गर आती है 
             सहारा ना दे होते सब दूर।

महामारी का छाया है 
         प्रकोप देखो,भूखे ;प्यासे 
सड़क में  सो जाता थक कर चूर।

काल रेल बनकर आती
       जिंदगी से ले जाती दूर।
शहरों की चकाचौंध, 
           विकास की बहती गंगा,
श्रमिक दिवस को मुझे
               बना देते कोहिनूर।

मेरे श्रम के आगे 
          जग की क्या बिसात,
बड़ी-बड़ी हवेलियों में 
            दिखता है मेरा नूर।

मैं दिहाड़ी मजदूर जैसे 
            घनचक्कर का नवरूप,
यहाँ भटकता,वहाँ भटकता,
              हो जाता कुरूप।
व्याख्या-प्रस्तुत कविता मजदूर अपनी व्यथा बताते हुए कहता है-मैं घनचक्कर जैसे घूमते हुए कुरुप हो जाता हूँ।सारे ऐशोआराम, खुशियाँ सबको मैं देता हूँ ,मगर मुझे केवल काँटो जैसे चुभने वाला अभाव मिलता है।मैं थक कर चूर हो जाता हूँ जहाँ मुझे रेल जिंदगी से कोसों दूर ले जाती है।शहरों का सारा वैभव में मेरा ही नूर दिखता है।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,( छ. ग.)

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