जिला- कोरबा छत्तीसगढ़
विधा-कविता
शीर्षक--" माँ "
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कविता---
दिन भर जहन में छाई रहती हो माँ!
हर पल याद आती हो माँ !
पंछियों की कलरव मे माँ!
सूरज की स्वर्णिम किरणों मे माँ!
पाठशाला के वक्त में माँ !
आपके हाथों की तरकारी में माँ!
भोजन की थाली मे माँ !
छोटी गुंथने की विधि में माँ!
ससुराल में निभने निभाने की संस्कारों में माँ !
वो निःशब्द सहन शक्ति मे माँ !
असहनीय दर्द में यादों में समा कर गहरी नींद
दे जाती हो माँ!
हर पल हर क्षण या याद आती हो माँ!
मुझसे दूर रह कर माँ!
जहन में छाई रहती हो माँ!
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ब्याख्या---रचनाकार माँ के वात्सल्य को याद करते हुए ब्यक्त कर रही है कि किस तरह माँ बच्चों से दूर रहने में याद आती है । सुबह सुबह माँ के पुकारने को रचनाकार पंछियों के कलरव धुन में और सूरज की किरणों को देखकर माँ की यादोँ का वर्णन कर रही है
माँ पाठशाला भेजने के लिए किस तरह से बाल बनाना सिखाती है और साथ ही साथ ससुराल के संस्कारों को भी सिखाती रहती है ।
इस तरह रचनाकार माँ की ममता का ,वात्सल्य का वर्णन कर रही है ।
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गोमती सिंह, कोरबा छत्तीसगढ़
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