Monday, May 25, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से गुलाब सिंह कंवर"गुलाब" की रचना- सुख

रचनाकार-गुलाब सिंह कंवर"गुलाब"
स्थान-खरसिया
जिला-रायगढ़
विधा-कविता
शीर्षक-सुख कहां .. बाहर में ढूंढे?

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कुछ लोग दूसरों के सुख से,
    दुःखी  बहुत  हो  जाते हैं।
      चिंता  में  हो  जाते  दुर्बल
         न   पीते  हैं  न  खाते   हैं।।

यही दुःख का कारण है जी,
    इसका सरल निवारण है।
      अहंकार को जीतने वाले,
        सदा आत्म सुख पाते हैं।।

 सेवा पर  उपकार को जो, जन,
          तन-मन  से  अपनाते हैं।
         ईर्ष्या, द्वेष, बुराई को त्याग,
          सत्य राह की ओर जाते हैं।।

आज  कहाँ ये  बातें  दिखती,
      इन  बातों  से  घबराते  हैं।
       अंदर में कुछ बाहर में कुछ,
           बेमन से रसम निभाते हैं।।

सुख   कहाँ  ,बाहर में ढूंढ़े...?
   ओ अंदर बैठा कुंडली मार।
    आत्मावलोकन कर लेने से,
      खुलते  मन  की   गांठें हैं।।

हिलमिलकर सभी रहें"गुलाब"
     पास-पड़ोसी काम आते हैं।
       सुख -दुःख में घर- परिवार,
          काम  आते रिश्ते-नाते हैं।।
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->गुलाब सिंह कंवर" गुलाब"
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व्याख्या -आज लोग अपने दुख से नहीं बल्कि दूसरों के सुख से दुखी हो जाते हैं।
सुख बाहर ढूंढने में नहीं वह तो अंदर बैठा है आत्मवलोकन करें।
सभी से मिलजुलकर रहें , सुख -दुःख में काम आएं, सुख की अनुभूति होगी।
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