रचनाकार - प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
विधा -- गीत(भजन)
शीर्षक - " लालच "
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गीत :--
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मनखे ह मनखे ले ,
काबर ओधा करे हे ।
होथे भरोसा जेकर ,
विहि धोखा करे हे ।१।
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छल अउ कपट जम्मो ,
मन म समाए रहिथे ।
मनके अइसन करिया ,
उज्जर चोला करे हे ।२।
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धुर्रा ल रद्दा के ,
कम मत जानो ।
लात के मरइय्या ल ,
मइला करे हे ।३।
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धन के तै कमइय्या ,
रामे नामे ल कमाले ।
खोंची भर धन बर तै ,
तोला मोला करे हे ।।
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मनखे ह मनखे ले ,
काबर ओधा करे हे ।
होथे भरोसा जेकर ,
विहि धोखा करे हे ।५।
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व्याख्या :---
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प्रस्तुत गीत म मैं मानव के लालची
स्वभाव ल उजागर करे के प्रयास
करे हों तथा आघु के पंक्ति म यहु
बताए के कोशिश करे हों कि कोई
ल भी हमन ल छोटे नहीं समझना
चाहिए , अइसन हमर समझ हर
हमला नुकसान पहुंचा सकथे ।।
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