Wednesday, May 27, 2020

छत्तीसगढ़ के रायपुर से एच एस अरमो की रचना

रचनाकार--एच-एस-अरमो  
जिला--रायपुर,छत्तीसगढ़ 
शीर्षक--पर्यावरण की बरबादी ।
विधा--कविता (मुक्त )


   पर्यावरण के भयावह बरबादी ने,
   प्रकृति का रूप-श्रृंगार है बदला,
   कहीं सूखा तो ,कहीं बाढ़ से तबाही,

  हो रही वृक्षों की अँधा-धुंध कटाई,
और जमीन से खनिजों की,
  हो रही लगातार है खुदाई ।

 पहाड़ों को है, हमने तोड़ा,
 और पहाड़ रूपी भवनों से,
  शहरों में है जोड़ा ।

 धरती के दर्द को,कोई नहीं जानता,
 आहत होती, भीतर ही भीतर,
 उसके मर्म को कोई नहीं जानता ।

 आज मानव की विविध खोजों ने,
 धरती में, तबाही का,
 मन्ज़र खड़ा है किया  ।

 इससे ही प्रकृति की खुशहाली मिटेगी
 और  हरियाली भी घटेगी,
 फिर इंसानों की तकलीफें भी बढ़ेगी ।

 तब होगा न ढंग से अनाज,
 न मिलेगी हमको शुद्ध प्राण-वायु ,
 क्या करेगा,तू इस धन-दौलत,रूपये-पैसों  का।

 सोचना होगा,इनकी बदौलत,
 क्या चल जायेगी तेरी जिन्दगी,
 जब भोजन-पानी ही न होगा,
 धरती पर,तो मिट जायेगी तेरी जिन्दगी ।

 सोचो जरा,बिन भोजन-पानी,प्राण-वायु के,
 कब तक जीवित रह पायेगें ।

 आओ पर्यावरण बचायें ,
प्रकृति का बेवजह दोहन रोकें,
प्रकृति-संरक्षण हेतु पेड़-पौधे लगायें ।

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