जिला--रायपुर,छत्तीसगढ़
शीर्षक--पर्यावरण की बरबादी ।
विधा--कविता (मुक्त )
पर्यावरण के भयावह बरबादी ने,
प्रकृति का रूप-श्रृंगार है बदला,
कहीं सूखा तो ,कहीं बाढ़ से तबाही,
हो रही वृक्षों की अँधा-धुंध कटाई,
और जमीन से खनिजों की,
हो रही लगातार है खुदाई ।
पहाड़ों को है, हमने तोड़ा,
और पहाड़ रूपी भवनों से,
शहरों में है जोड़ा ।
धरती के दर्द को,कोई नहीं जानता,
आहत होती, भीतर ही भीतर,
उसके मर्म को कोई नहीं जानता ।
आज मानव की विविध खोजों ने,
धरती में, तबाही का,
मन्ज़र खड़ा है किया ।
इससे ही प्रकृति की खुशहाली मिटेगी
और हरियाली भी घटेगी,
फिर इंसानों की तकलीफें भी बढ़ेगी ।
तब होगा न ढंग से अनाज,
न मिलेगी हमको शुद्ध प्राण-वायु ,
क्या करेगा,तू इस धन-दौलत,रूपये-पैसों का।
सोचना होगा,इनकी बदौलत,
क्या चल जायेगी तेरी जिन्दगी,
जब भोजन-पानी ही न होगा,
धरती पर,तो मिट जायेगी तेरी जिन्दगी ।
सोचो जरा,बिन भोजन-पानी,प्राण-वायु के,
कब तक जीवित रह पायेगें ।
आओ पर्यावरण बचायें ,
प्रकृति का बेवजह दोहन रोकें,
प्रकृति-संरक्षण हेतु पेड़-पौधे लगायें ।
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