जिला :- महासमुन्द
विधा :- कविता( मानवीकरण अलंकार )
शीर्षक :- भोर हो गई ।
घुंघट उठाया ऊषा ने,
मुख मण्डल में आभा छाई,
देख रवि की मुस्कान मोहक,
खग दल ने है गीत सुनाई,
स्वागत में दिनकर के आने के,
चलती पवन पुरवाई,
जाग उठे कमल पुष्प पोखर में,
उठकर ली अंगड़ाई,
कुकडू - कू कह मुर्गा बोला,
जागो राही भोर हो गई,
लाली चादर ओढ़ा आकाश ने,
चाँद - तारे सब ओझल हो गई,
उत्साह, उमंग की चल पड़ी बयार,
धरा तो अब चित चोर हो गई,
सुनहरी छटा बिखरी प्रकृति में,
और नव भोर हो गई ।
व्याख्या :- उपरोक्त रचना में रचनाकार ने प्रकृति में होते भोर के प्रभाव को मानवीकरण कर प्रस्तुत करते हुए कहा है कि भोर होते ही ऊषा ने घुंघट उठाई और चारों ओर प्रकाश छा गया। चिड़ियों के दल ने सूरज के स्वागत में गीत सुनाए, पुरवाई पवन चलने लगी, कमल के पुष्प ऐसे खिले मानो उठकर अंगडाई ले रहे हो, मुर्गा बांग देते हुए राही को उठा रहा है, सूरज के उदित होने से ऐसा लग रहा है मानों आसमान ने लाल रंग का चादर ओढ़ लिया है, चांद और तारे आँखों से ओझल हो गए हैं, और इस तरह उत्साह से भरी एक नई भोर हुई है।
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