जिला:- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विषय:- मानवीकरण अलंकार
शिर्षक:- तू चल दे बसंती
*तू चल दे बसंती*
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तू चल दे बसंती उपवन से,वह दुल्हन बनकर आएगी।
आसमान की परी है, वह धरती पर भी छायेगी।
तू चल दे बसंती उपवन से.....
कह देना सुर्ख सेमल से,वह घुंघट से चमन सजायेगी।
उसके होठों की देख लाली,पलाश भी सरमायेगी।
तू चल दे बसंती उपवन से....
मन भर गया मंजरी से ,खुशबु नही सुहायेगी।
अपने सांसों कि खुशबु से वह,उपवन को महकायेगी।
तू चल दे बसंती........
मद्धम हुआ महुए का रस,अब और नही
बहकायेगी।
अपने आंखों के मधुशाला से वह,जाम हमे पिलाएगी।।
तू चल दे बसंती...........
बेसुरे लगे पंक्षियों का कलरव,गीत नही अब भायेगी।
कूकती कोयल से सुंदर,मधुर गीत गुनगुनायेगी।।
तू चल दे बसंती उपवन से.....
बयारें अब समर हो गयी,मन को नही बहलायेगी।
मदहोश हो जाएंगे सभी,जब वह जुल्फे लहराएंगी।
तू चल दे बसंती उपवन से.....
अक्षय अब मधुमास होगा,पतझड़ न मुरझायेगी।
पायल के झंकारों से वह,हर ऋतु को रिझायेगी।
तू चल दे बसंती उपवन से..........
अजय पटनायक
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