Friday, May 29, 2020

छत्तीसगढ़ के कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- मुखर प्रकृति

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
     जिला-  कांकेर  
   विषय-मानवीकरण अलंकार
शीर्षक-मुखर प्रकृति

     ~ •°• *मुखर प्रकृति* •°• ~
प्राची में उषा को 
  देख-देख कर,
    मुखर प्रकृति 
      अब हर्षाने लगी।

कलियाँ मुस्कुराने लगी,
  फूल बतियाने लगे,
    सरोवर में सरसिज 
      रवि का यश गाने लगे।

नलिन-पंखुड़ियाँ 
  जल बीच लहराने लगी।
    नभ में बादलों की गर्जना  
      विवाह गीत  गाने लगे,
        स्याह आसमाँ में दामिनी 
            प्रकाश बिखराने लगी।

मेघ बन आए बराती, 
  ठाठ अपनी दिखाने लगे,
    देख प्रकृति की बदली छटा 
       दुनियाँ कृतज्ञ होने लगी।

वर्षा संसृति का भूख 
  प्यास मिटाने लगी है,
    धरा हरीतिमा से लसित 
       नववधु बन शर्माने लगी।

प्रकृति निहाल हो उठी ,
  सृष्टि प्रमुदित होने !लगी।
    धरा में नव जीवन की फिर 
      नवरस भरने लगी।

*व्याख्या*:- उपरोक्त कविता में पूरी प्रकृति का मानवीकरण करण किया गया है,अर्थात कली,फूल,कमल,बादल, वर्षा और धरा सब मनुष्य के समान हँसना, मुस्कुराना,बतियाना,शर्माना आदि आचरण करने लगे।

     नलिनी बाजपेयी

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