शीर्षक:- *धरती की गोद में*
राज्य:- छत्तीसगढ़
~° *धरती की गोद में* ° ~
"""""""""""""""""""'''"""""""""""""""
धरती की गोद में,
हरी भरी वल्कल
है शुभकारी,
तुम जननी मेरी माँ संग
सबकी माँ हो महतारी।
तुम्हीं सृष्टि का आधार हो,
तुम सा न कोई उपकारी,
चाहे नदियाँ बहे,
या पर्वत खड़ा अचल
बिन कोई सवारी।
निस्वार्थ, निष्काम भाव से,
सब पर है ममता वारी,
भू,भूमि,मेदिनी,क्षिति, वसुधा,
वसुंधरा है पुनीत नाम तुम्हारे।
सारी सभ्यता, संस्कृति ,
इतिहास अपने गोद सँभारी,
अस्त्र-शस्त्र, मिसाइलें संग
प्रलय और निर्माण
सब गोद में पाली।
एक विस्तृत, विशाल, धरा,
मगर महाद्वीपों और
देशों में बंटी बेचारी।
युगों-युगों की गाथा वेद
पुराणों में भरी है सारी,
दुनियाँ कहती जननी
जन्मभूमि स्वर्ग से भी प्यारी।
वसुओं को धारण
करने वाली वसुंधरा,
नित नवीन रंगों से
हरी-भरी रहे
धरती की गोद न्यारी।
धरती की गोद में हरी -भरी
वल्कल है शुभकारी,
तुम जननी संग मेरी माँ
संग सबकी हो महतारी।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ. ग.)
No comments:
Post a Comment